डॉ. नवाज़ देवबन्दी के 3 चुनिंदा ग़ज़लें

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डॉ. नवाज़ देवबन्दी के 3 चुनिंदा ग़ज़लें

किसी शायर के लिए सब से बड़ा एजाज (कमाल) वो है, जब लोग उस शायर के क़लाम को सर आंखों पर बैठाएं। और आज के काव्य कैफ़े में हमारे साथ एक ऐसे ही शायर मौज़ूद हैं नवाज देवबंदी उर्दू शायरी के एक मशहूर नामों में से एक हैं, 16 जुलाई 1956 को यूपी के सहारनपुर के देवबंद में जन्मे नवाज़ साहब ने 1990 में उर्दू से जर्नलिज्म पर रिसर्च कर पी.एच.डी की और डॉ. नवाज़ देवबन्दी हो गए। शायरी तो उनके मिजाज़ में थी ही। ‘पहली बारिश’ और ‘पहला आसमान’ नवाज़ साहब के ग़ज़ल संग्रह हैं। प्रस्तुत है उनकी 3 चुनिंदा ग़ज़लें-

सफ़र में मुश्किलें आएँ तो जुरअत और बढ़ती है
कोई जब रास्ता रोके तो हिम्मत और बढ़ती है

बुझाने को हवा के साथ गर बारिश भी आ जाए
चराग़-ए-बे-हक़ीक़त की हक़ीक़त और बढ़ती है

मिरी कमज़ोरियों पर जब कोई तन्क़ीद करता है
वो दुश्मन क्यूँ न हो उस से मोहब्बत और बढ़ती है

ज़रूरत में अज़ीज़ों की अगर कुछ काम आ जाओ
रक़म भी डूब जाती है अदावत और बढ़ती है

अगर बिकने पे आ जाओ तो घट जाते हैं दाम अक्सर
न बिकने का इरादा हो तो क़ीमत और बढ़ती है
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वहाँ कैसे कोई दिया जले जहाँ दूर तक ये हवा न हो
उन्हें हाल-ए-दिल न सुनाइए जिन्हें दर्द-ए-दिल का पता न हो

हों अजब तरह की शिकायतें हों अजब तरह की इनायतें
तुझे मुझ से शिकवे हज़ार हों मुझे तुझ से कोई गिला न हो

कोई ऐसा शे’र भी दे ख़ुदा जो तिरी अता हो तिरी अता
कभी जैसा मैं ने कहा न हो कभी जैसा मैं ने सुना न हो

न दिए का है न हवा का है यहाँ जो भी कुछ है ख़ुदा का है
यहाँ ऐसा कोई दिया नहीं जो जला हो और वो बुझा न हो

मैं मरीज़-ए-इश्क़ हूँ चारागर तू है दर्द-ए-इश्क़ से बे-ख़बर
ये तड़प ही उस का इलाज है ये तड़प न हो तो शिफ़ा न हो

ख़ुद को कितना छोटा करना पड़ता है
बेटे से समझौता करना पड़ता है

जब औलादें नालायक़ हो जाती हैं
अपने ऊपर ग़ुस्सा करना पड़ता है

सच्चाई को अपनाना आसान नहीं
दुनिया भर से झगड़ा करना पड़ता है

जब सारे के सारे ही बे-पर्दा हों
ऐसे में ख़ुद पर्दा करना पड़ता है

प्यासों की बस्ती में शो’ले भड़का कर
फिर पानी को महँगा करना पड़ता है

हँस कर अपने चेहरे की हर सिलवट पर
शीशे को शर्मिंदा करना पड़ता है

Written by Dr nawaz deobandi

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