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गांधी जी की यात्रा




अर्थ की जिस शिला पर हमारे युग के न जाने कितने साधकों की साधना तरियां चूर चूर हो चुकी हैं, उसी को वे अपने अदम्य वेग में पार कर के आए थे। उनके जीवन पर उस संघर्ष के जो कुछ आघात है वे उनके हाथ के नहीं, शक्ति के प्रमाण पत्र हैं। उनकी, कठोर श्रम, गम्भीर दर्शन और सजग दया भाव की त्रिवेणी न अछोर मरु में सूखती है न अकूल समुद्र में अस्तित्व खोती है।

जीवन की दृष्टि से गांधीजी और शास्त्रीजी किसी दुर्लभ सीप में ढले सुडौल मोती नहीं हैं, जिसे अपनी महाघऺता का साथ देने के लिए स्व‌‌णऺ और सौंदर्य-प्रतिष्ठा के लिए अलंकार रुप चाहिए। वे तो अनगढ़ पारस के भारी शिलाखंड है। न मुकुट में जड़ कर कोई उसकी गुरुता संभाल सकता है न पदयात्रा बनाकर कोई उनके जैसा भार‌ उठा सकता है। वह जहां है, वही उनका स्पर्श सुलभ है। यदि स्पर्श करने वाले में मानवता के लौह परमाणु हैं तो किसी और से भी स्पर्श करने पर वह स्वणऺ बन जाएगा। उनके अमूल्यता दूसरों का मूल्य बढ़ाने में है। उनके मूल्य में कोई कुछ जोड़ सकता है न घटा सकता है।

आज हम दम्भ और स्पधाऺ, अज्ञान और भ्रान्ति के ऐसी कुहेलिका में चल रहे हैं जिससे स्वयं को पहचानना तक कठिन है, सहयात्रियों को यथार्थता में जानने का प्रश्न ही नहीं उठता। पर आने वाले युग में गांधी जी की यात्रा का मूल्य याद भी रखेगी या नहीं कहना एक कठिन प्रश्नन है?

 तनवीर शेख़

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