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रिक्शेवाले


वो मात्र रिक्शे पर लोगों को नहीं ढोते 

इक्कीसवीं सदी में भी रिक्शेवाले का होना 

'कलंक' को भी ढोते हैं ।


हमारे बोझ को खींचने से 

जितना वे नहीं थकते 


उतना खाली हाथ 

घर जाने के बोझ से!  


बोझ ढोना इनकी नियति है 


और ये नियति__

व्यवस्था की नाकामी!  


                           ___आदित्य रहबर

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