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मिर्ज़ा ग़ालिब-उर्दू के अज़ीम शायरों में से एक...!!




 

मिर्ज़ा ग़ालिब उर्दू के अज़ीम शायरों में से एक हैं और शायद ही ऐसा कोई होगा जो ग़ालिब के नाम से नावाक़िफ़ होगा। हालांकि मिर्ज़ा ग़ालिब ने अपनी शायरी में फ़ारसी का बहुत प्रयोग किया इसलिए वह आम-जम की समझ से दूर रहे लेकिन तब भी दिल के क़रीब रहे। 
चुनांचे पेश हैं मिर्ज़ा ग़ालिब के कुछ मशहूर सरल शेर 


हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है 
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू क्या है 

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन 
हमारे जैब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है 

जला है जिस्म जहां दिल भी जल गया होगा 
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तुजू क्या है 

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल 
जब आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है 

वो चीज़ जिस के लिए हम को हो बहिश्त अज़ीज़ 
सिवाए बादा-ए-गुलफ़ाम-ए-मुश्क-बू क्या है 

पियूं शराब अगर ख़ुम भी देख लूं दो-चार 
ये शीशा ओ क़दह ओ कूज़ा ओ सुबू क्या है 

रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी 
तो किस उमीद पे कहिए कि आरज़ू क्या है 

हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता 
वगर्ना शहर में 'ग़ालिब' की आबरू क्या है 

--मिर्जा गालिब

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